देह पर रक्तवर्णीय मिट्टी पोतकर वे शरीर की आच्छादन प्रवृत्तिा की तुष्टि करते हैं। उनकी स्त्रियों में इक्की-दुक्की ललना विलास-लोलुप निकली तो


वृक्ष का एकाध पत्ता कटि के आगे लटका लेती। उन लोगों की स्वप्नसृष्टि को, जो आजीवन विलासिता का तिरस्कार करते हुए सादगीपूर्ण रहन-सहन की माला जपते हैं, वास्तविक रूप देने वाले ये जावरा सर्वथा वन्य स्थिति में हैं और नागरी तथा मानुषिक जीवन स्थित प्रलोभनों से अभी तक दूर रहे हैं। जब वे दियासलाई और वस्त्र नहीं जानते तथा बैलगाड़ियों से भी परिचित नहीं हैं, तो रेलगाड़ी, हवाई जहाज, प्रचंड जलयान आदि मानवी पतितावस्थांतर्गत साधनों का उल्लेख ही नहीं करना चाहिए। उन्हें कुरसी, जूते, कोठी-बंगला, खेती-बाड़ी, खाद्यान्न, यंत्र, चरखा भी ज्ञात नहीं सादगीयुक्त जीवन के भक्त संप्रदायी के नाम से ही नहीं अपितू उसकी अभिलाषा से भी जावरा लोग अपरिचित हैं। उन आचार्यो को भी, जो


147 of 1280

हमारे हाथ में आने के कारण हमारा कर्तव्य है कि हम वह परंपरा निभाएं। चीखो, चिल्लाओं, नाचो गालियां दो। चालान का नाम रोशन करना चाहिए न भाई!’

और बंदियों में जो उस बीभत्स विनोद तथा निर्लज्ज व्यवहार का नंगा नृत्य कर रहे थे, वे कुछ अंशों में कर्तव्य भावना से उत्तोजित होकर ही ऐसा कर रहे थे। बीच में ही कोई निर्लज्ज शिरोमणि चीखता, ‘चालान का नाम राखियो, भाई! और फिर सीटियां तालियां, बेड़ियों की झनझनाहट की धमा-चैकड़ी शुरू। पूर्वापर चले आए इस चालान का ‘एवं प्रवर्तितं


147 of 2123