रूप में लाए गए एक-दो मनुष्यों की दुम की हड्डी दो-तीन इंच ऊपर उठी हुई है, जिससे उन्हें कुरसी पर पीठ टिकाकर सीधा बैठना भी असंभव था। उनकी इस दुम पर बालों का अभाव था और उससे सटकर दुम के बालों के गुच्छे की स्नायु वहां नहीं लटक रही थी। उनकी ठुड्डी तथा मुख की रचना हू-बहू वानर जैसी थी।
इस प्रकार के वानर सदृश मानव इस इलाके में कभी-कभी मिलते हैं, जिनकी दुम की हड्डी होती है। उनकी वाचा बहुतांश में परिणतावस्था में होती है। अंदमान में जो वन्यजन हैं उनमें जावरा नामक जनजाति साधारणतः चार-साढे़ चार फीट लंबी होती है। उनका वर्ण काला-कलूटा, केश कड़े, रूखे-रूखे से छोटे-छोटे गुच्छों में मुडे़ हुए। इनकी दाढ़ी-मूंछ तो कभी निकलती ही नहीं। वे किसी साधु-महात्मा समान नग्नावस्था में ही घूमते-फिरते हैं, वस्त्र परिधान का घोर पातक वे कभी करते ही नहीं। किसी साधु-महात्मा सदृश
रूप ऐसा था कि थाने में चालान का आगमन होते ही सिपाही, हवलदार, जेलर, सुपरिटेंडेंट सभी चिंतामग्न होने चाहिए, दीवारें टूटनी चाहिए, सीखचें उखड़ने चाहिए, सिर फूटने चाहिए, दो-एक सिपाहियों को उनकी ‘हां जी, हां ज’ करते हुए जैसे-तैसे अपनी जान बचानी चाहिए- तभी उसे चालान कहा जाएगा-तभी उसका नाम सार्थक होगा। अन्यथा, बदमाशों के वे आचार्य, कुलगुरू नूतन सदस्यों को प्रोत्साहित करते हुए कहते,‘फिर बदमाशी क्यों? यही चालान की पूर्व परंपरा है। आज इस नामचीन संस्था का संचालन