पचास वर्षों के अंदर-अंदर तत्रस्थ सभी निवासियों को बिना वस्त्रों के रहना पड़ा तथा खेती-बाड़ी, शाकाहार और अन्नाभाव में मांसाहारी बनना पड़ा। ऐसी अवस्था में अंदमान में समुद्र-गमन निषिद्व समझने के कालखंड में अंदमान से पहले ही गए हुए भारतीय तत्रस्थ मूल वन्य निवासियों को सुधारने के बदले स्वयं ही जंगली बने और आगे नए रक्त-संबंध असंभव होने के कारण वे वन्य निवासी या तो लुप्त हो गए होंगे या उनका विनाश हो गया होगा, क्यांेकि इस द्वीप में आज भी जो लोग मूल निवासी के रूप में पाए जाते हैं, उनका रहन-सहन काफी हद तक विश्व के अन्य प्रदेशों की उन वन्य जनजातियों से ही मिलता-जुलता है, जिनकी गणना रहन-सहन के ढंग से अति प्राचीन जनजातियों में की जाती है। जावा द्वीप के आस-पास फेले हुए द्वीप समूह बंदर जैसे मनुष्यों के लिए प्रसिद्व हैं। स्वयं वहां के डाॅक्टरों ने हमें दिखाया कि निकोबार से बंदी के


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चालान का नाम

क्यांेकि चालान काराजगत् की एक महनीय संस्था ही बन गई थी, इसलिए उसका नाम कोई साधारण बात नहीं थी। उस चालान के सभासद का उच्च स्ािान हमें सहजता से नहीं मिला था। पुलिस चैकी, मजिस्ट्रेट, कोर्ट, सेशन, ज्यूरी, हाईकोर्ट आदि कई परीक्षाओं में खरा उतरा अथवा चढ़ा मनुष्य ही आजन्म कारावास, कालेपानी की प्रतिष्ठा प्राप्त कर पाता है। तिसपर भी चुन-चुनकर जो विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि रूपी बदमाश यहां आए थे, उन बदमाशों की यह प्रमुख संस्था थी। उसका पूर्वापर लौकिक


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