अधिक समय तक नहीं टिक सका, उसी प्रकार उन भारतीय बस्तियों की मानसिक, बौद्विक अथवा धार्मिक संस्कृति का प्रभाव भी तटस्थ मूल निवासी जनों पर कुछ टिका दिखाई नहीं देता। एक नन्हा सा द्वीप-सागर से घिरा हुआ। उस पर सतत बस्ती बनाकर उसका प्राकृतिक वन्य स्वरूप परिवर्तित करने के लिए हिंदुस्थान का उससे अव्याहत संबंध बना रहना अत्यंत आवश्यक था। आधुनिक जीवन के सारे उपकरण हिंदुस्थान से वहां ले जाने से ही वहां के जीवन-सुधार का क्रम सरल हो सकता है। हिंदुस्थान अथवा बाह्म सुसंस्कृत जगत् से नाता टूटते ही नए पहुंचे मनुष्यों का भी तत्रस्थ वन्य अवस्था में पहंुच जाना स्वाभाविक है। जर्मन महायुद्व के समय कभी-कभी चार महीनें जब हिंदुस्थान के जलयान सामान सहित अंदमान नहीं जा सके, तब उस कालखंड में जीवन की सुधारक आवश्यकताओं अथवा क्रम को इतनी अधिक मात्रा में त्यागना अनिवार्य हो गया कि
में अभी भी पानी शेष है और इसलिए इस नंगे नृत्य में बेधड़क हिस्सा लेने का निलर््ाज्ज साहस अभी तक नहीं कर सके थे, चिल्ला-चिल्लाकर कहते, ‘ऐ भाई, गाओ। ऐ साला, चिल्ला न! अरे अपने चालान के नाम का डंका बजना चाहिए न! पिछली बार जब हम यहां आए तब दरवाजों के सीखचों को पकड़-पकड़कर उन्हें जोर-जोर से हिलाते और बरतन दीवार पर मारते रहे, सिपाही गिड़गिड़ाकर पैर पकड़ने
लगे और उन्होंने हरेक को चुपचाप तमाकू थमाा दी। भई, गला फाड़-फाड़कर चिल्लाओं चालान का नाम मत डुबोना।’