समुद्र तट पर उन्मुक्तः इधर-उधर बिखरी होती है। जैसे सम्राट हर्ष के किसी मार्ग से चलते समय बरसाए गए सुवर्ण मोतियांे के फूल इधर-उधर बिखरे होते थे, उसी तरह शंख, सीपियों तथा सुंदर पत्थरों पर कोई चितेरा अपनी तूलिका से एक-एक अव्यवस्थित कुशलता की फटकार निश्चित ही इस समुद्र तट पर बिखेरता है। विविध
मछलियां-मगरमच्छ! स्मुद्र स्थित किसी मत्स्य की पूंॅछ से एक ऐसा तीक्ष्ण सिरे का चाबुक जुड़ा हुआ कि जिसकी एक फटकार से टांगों के मांस की धज्जियांॅ उड़ जाएं। किसी का मुंह अश्वनुमा, किसी की पूंछ में बिजली जितना शक्तिशाली करंट कि उसके क्रोध से आस-पास विद्युत् के झटके लगें। किसी का मुंह तो मनुष्य के मुख जैसा हालांकि बहुत कम, परंतु विश्वश्नीय यात्रियों ने स्वयं देखकर इसका वर्णन किया था। इस तरह नानाविध सामुहिक प्राणियों का इस द्वीप के रेतीले सागर तट और उसकी लहरों पर स्वच्छंद विहार चलता रहता है।
उन सभी वस्तुओं से, जो जीवन को रमणीयता प्रदान करती हैं, वंचित होकर भी उस कारावास में, जहां हुए पशु भी थर-थर कांपते हैं, बेड़ियों में जकड़े, पाप करते-करते बेशर्म हो गए, पाप से पूरा परिचय न होने के कारण जी तोड़-तोड़कर खानेवाले, क्रोध में लाल-पीला होकर कुढ़ते रहने वाले और दुःख से हिचकियां भर-भरकर रोनेवाले सैकड़ों जीव कराहते हुए ही सही, जोर-जोर से ठहाके लगा रहे थे। तीव्र संकट के मनोरंजनार्थ साधारण विनोद पर्याप्त न होने से बीभत्स विनोद रूपी दारू