में यहां भारतीय पक्षी कुछ अधिक संख्या में नहीं थ। अंग्रेज सरकार ने मैना, तोता, बाज़, गिलहरी, मोर आदि जीवों को यहां लाकर छोड़ दिया; इतना ही नहीं, कौए मंगवाकर उनकी बस्ती बसाने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। पक्षियों की तरह हिरन, कुत्तो, सियार आदि पशु तथा बहुत सारे पालतू प्राणी भी यहां उपलब्ध हैं।
समुद्री आश्चर्य की तो कोई सीमा ही नहीं। शंख, सीपियां, पत्थर, कितनी रंग-बिरंगी सुंदर आकृतियांॅ, कितने प्रकारए मानो विश्वकर्मा का वैचिन्न्य हो! उसकी शोभा का वर्णन कैसे किया जाए?
ऐसे रंग की सीपियां, शंख कि जिनके इंद्रधनुष की शोभा भी लज्जा से शीश झुकाए। उनमें कम-से-कम एक की सुंदरता भी कोई कुशल चितेरा किसी चित्र में उंॅडेल सके तो मनुष्य उस कलाकृति को प्रदर्शनियों में सदियों तक सजाकर रखेगा। इस तरह की अनेक सुंदर-सुंदर वस्तुएं ही नहीं अपितु प्रणियों की भी रचना, जिनकी रेलपेल
बनाए गए थे, उनमें से कई में यह ध्येय वाक्य होता-‘एन्जाॅय टिल दाउ गोएस्ट मैड! एन्जाॅय फाॅर टुमारों वी डाय!!’ (हंसो बेटा, इतना हंसो कि उन्माद हो जाए, क्यांेकि कल तुम्हें कराल काल का ग्रास जो बनना है!) इस तरह के क्रीड़ालयों में उन्मुक्त हास्य-हुल्लड़ सभ्यता सभी नियमित बंधनों को पैरों तले कुचलकर दिन-रात उच्छृंखल तांडव करती रहती । वह हास्य जानता था कि आज जो उसका नाम इस तांडव पटल पर है, वही उसका कल मृत्यु के सरकारी पटल पर दर्ज किया जाएगा। तात्कालिक दुःख का हास्य सभी हास्यों में विकट होता है।