कहीं छिपी बैठी ये जोंकें रिमझिम बरखा बरसने लगते ही बाहर निकलती हैं। मानवी गंध संघ्ूाते ही आनंदित होती हैं। ऊपर से वृक्षों, पत्तों से वे टप-टप कूद पड़ती है, नीचे पाॅंव पड़ते ही वे तलवे चाटने लगती हैं और मानवी शरीर की पिंडलियों, जांॅघों-जो भी हिस्सा मिले, उससे चिपककर सुप-सुप लहू सुड़कने लगती हैं। बड़े-बड़े बदमाश पाजी कंटक लोग जो कारागृह के कठोर-से-कठोर दंड से नहीं घबराते, वे जब जंगल
की कटाई के लिए जाते हैं तो इन जोंको के भय से कांॅपने लगते हैं। जंगल से काम करके बंदी जब शाम ढले वापस लौटते तब ऐसा लगता वे लहू में नहाकर आए हैं, क्यांेकि यहां-वहां सर्वत्र जोंकों के काटने से शरीर में छेद हो जाते और उन छेदों से लहू की पतली धारा निकलती रहती। अच्छा, ये जोंकें भी एक या दो नहीं, इधर मनुष्य अपने हाथों से मुट्ठी भर-भरकर उन्हें अपने शरीर से उखाड़कर
में विकट होता है। दुःख का भार असहनीय होने अथवा निर्लज्जता के कंधे से उसे हलके से फेंक देने से दुःख भी खिलखिलाने लगता है। शोक भी उसी तरह हंसता है, जिस तरह हर्ष का अतिरेक होने पर वह रोता है। कहा जाता है कि फ्रांस की राज्यक्रांति के दौरान अमानष रक्तरंजन वध, हत्याओं, फांसी और मारकाट की पेरिस में अति हो गई थी, और ऐसी भीषण स्थिति हो गई थी कि आज प्रधानमंत्री बने और कल फांसी। उस समय जो नाट्यगृह कभी इतने नहीं भरते थे, वे भी खचाखच भरे रहते थे और मधुशालाएं, क्रीड़ालय सतत नाच-गानांे, हंसी-कहकहों से गूंजते रहते थे।