में जंगल के सूखे पत्तों की एक के ऊपर एक परतें जमा होकर सड़ती हैं। इसी से मलेरिया का प्रादुर्भाव तथा प्रभाव अत्यंत कष्टप्रद होता है। मक्खियां जो इस मलेेरिया का प्रसार करती है, इधर इतनी विपुल और विविध जातियांे की हैं कि वर्णन करना असंभव है। कुछ भीतर की ओर मच्छर सदृश मक्खियां झंुड-के-झुंड इधर-उधर एक साथ गुनगुनाती हुई भिनभिनाती हैं जैसे तार में पिरोया हुआ जाल। कुछ बड़ी-बड़ी मक्खियां अपने लंबे-लंबे पैरों पर खड़ी रहकर इतनी तेजी से झूलती हैं कि उस दोलायमान अवस्था में यह कहना कठिन होता है कि वह एक काली रेखा है या मक्खी।
जोंक, साॅंप व कनखजूरे
जंगलों में इन मक्खियों के अतिरिक्त जो मलेरिया का प्रसार करती हैं-जोंकों की भी भरमार होती है। कीचड़ में, नीचे पड़े हुए पत्तों के ढेरों में ही नहीं अपितू वृक्षों की डालियों पर, पत्तों पर ये जोंके चिपकी रहती हैं। गरमी में दुबककर
के अंदर पांव रखते ही जिस कोठरी में मुझे बंद किया गया था, वह कोठरी यद्यपि अकेली थी तथापि उससे एक के बाद एक लगी हुई कोठरियों में अंदमान जा रहे सारे बंदियों के भरे होने और भोजन करते-घुमते उनके भाषण, उसांसें, रोना और हंसना यह सब युनने और देखने से बहुत दिन के मेरे मन को उस दुःख में भी कुछ आनंद आए बिना न रहा। मैंने उन बंदियों का ‘हंसना’ जो कहा, वह सच है। दुःख और यातनाओं की भयपद्र सुरंग के दुःख की अति में हंसना ही हर तरह की हंसी