रहे हैं, दहाड़ते हैं- ‘ऐ कैदी, उठो इधर से। चलो, उधर बैठो।’ और मुझे उनका आदेश पालन करना होता है।
सागर शांत था। किसी साामुहिक दैत्य की तरह खर्राटे भर रहा था। वाष्पनौका फिसलती हुई किसी आसन्नमरण की नाड़ी सदृश मंद-मंद चल रही थी। ऊपर से सूर्य क्रूरतापूर्वक सभी पर अंगार बरसा रहा था। अत्यधिक गरमी थी, अंदमान निकट आ रहा था। अधिकारियों और यात्रियों ने अब मुझसे बात करना बंद कर दिया था। वे ऐसी दूरियाॅं साध रहे थे जैसे मुझसे सर्वथा अपरिचित हों। कालेपानी की छाया मुझपर स्पष्ट दिखाई देने लगी।
प्रकरण -6
अंदमान का वर्णन
अंदमान, निकोबार तथा उसके निकटतक द्वीपपुंज का हिंदुस्थान के इतिहास से ही नहीं अपितू भविष्य से भी संबंध होने के कारण प्र्रत्येक हिंदवासी को उसकी अल्प ही क्यों न हो, जानकारी अवश्य है। हिंदुस्थान के बाहर अर्वाचीन काल में हिंदू संस्कृति
इस भय से सहमा हुआ है कि एक बार कालेपानी गया तो अपना गांव और स्वजन फिर कब दिखेंगे। देखिए, इन दो सिरों के बीच में उग्रता, लज्जा,
निर्लज्जता तथा क्रूरता की विविध प्रतियां क्रमशः लगाई गई थी, जो इस घिनौने भोंडे जुलूस में बेड़िया खनकाती हुई जा रही थी।
बात-की-बात में वह जुलूस परकोटे के भीतर घुस गया। उनके निरीक्षणार्थ काराधिकारी चल पड़ा। यह समाचार मिलते ही प्रत्येक बंदी सिर पर पांव रखे दौड़ा और यथास्थान पहुंचकर काम का बहाना करने लगा। सब भोले बने