समस्त मानव-जाति उनकी आभारी होगी। जिन्हें इस विजय का वह महान् श्रेय प्राप्त होनेवाला है, उनमें मैं भी अंश भागी होऊंगा। कितना महान् कितना उज्जवल है यह भविष्य काल!
प्रस्तुत स्थिति
परंतु वर्तमान! तुम्हारी प्रस्तुत स्थिति? स्वप्न, स्वप्न! अरे मूर्ख, तुम्हें आ रहे भविष्य के ये सपने केवल स्वप्न ही होंगे। वैदिक काल से ऐसे स्वप्न देखते-देखते मनुष्य को युग बीत गए। भविष्य के उन सुनहरे सपनों का उपयोग वर्तमान की रात्रि के घनघोर मोहांधकर में पल भर के लिए प्रकाश देना ही है। इस सागर को ही देखो- कितनी अविस्मरणीय, अगम्य राक्षसी शक्ति। उसके शरीर पर यह नौका कितने मजे में लहराती चल रही है। क्यों? इसलिए कि वह इसे सह लेता है। जैसे कोई प्रचंड राक्षस किसी तुच्छ मच्छर को अपने शरीर पर बैठने देता है। पल भर उस मच्छर का साहस देखकर अपना मनोरंजन करता है, फिर एक ही चपत
कैसी कटेगी, उनको यही आशा थी कि आगे चलकर कहीं यह सचमुच जमादार बना तो हमें सहारा देगा- अतः बेचारे अभी से उसकी सेवा-चाकरी में लगे रहते, उसकी ‘हां जी, हां जी’ करते। रास्ते से बंदियों की यह टोली आते ही स्टेशन पर कोई केले, नारियल, खाद्य वस्तुएं, पैसे आदि दान करते। उसमें से पैसे-वैसे मिलने पर ये बंदी अपने इस ‘जमादार’ को दे देते और चुपके से उसके पैर रगड़ते। वह भी उन लोगों को डिगीन साहब या फिर मांटफर्ड साहब से कहकर आज ही मुकादमी का