बिखर रहे हैं कि कालापानी आएगा। यात्रा की धांधली में दबी हुई लाचारी, विरह तथा शोकपूर्ण विचार मेरे चित्त पर उमड़-उमड़कर ऊपर उठकर ह्नदय में घुसकर उसे चंचल बना रहे हैं, जैसे सागर की तलहटी की मछलियां उछल-उछलकर ऊपरी सतह में घुसती हैं। मैं कालेपानी की छांव से घिर गया हूं।
सागर शांत है, किसी झील की तरह स्तब्ध और उस पर यह जलयान ऐसे सलिल
विहार कर रहा है जैसे हिम प्रदेश में बालक मजे में हिम पर फिसलते हैं। सूरज पृथ्वी की ओर टकटकी बांधकर निरीक्षण कर रहा है, जैसे कि मानव द्वारा जड़ सृष्टि पर प्राप्त की हुई इस अपूर्व विजय से वह विस्मित हो गया हो। कितना विशाल सागर और यह कैसी पिद्दी सी नौका। परंतु उस नौका में एक छोटी सी कोठरी में बैठा एक मानव उस सागर को अपने चप्पू के अंकुश से अपनी इच्छानुसार मोड़कर उसे अपना गुलाम बनाए हुए
हुआ, ऊंचे स्वर में बात करते-करते किसी विजयी वीर की तरह घूम रहा है। सिपाही कहते हैं, दो बार कालेपानी की हवा खाकर आया है और अब आजीवन कालेपानी पर जा रहा है। वह स्वयं यह शेखी बघार रहा है कि वह कालेपानी पर जमादारी कर चुका है, वहां उसने अपनी ऐसी धाक जमाई है कि एक बंदीवान लौंडे को उसकी अनुमति के बिना उसके एक शत्रु से बतियाते देखकर डंडे के एक ही वार से उसका सिर फोड़कर नीचे गिरा दिया। दूसरे दिन वह मर ही गया। परंतु इस दुष्ट ने