पकड़ा गया। यूरोप में दर-दर की ठोकरें खाते हुए भटकने के दुःख जीवन का मैंने अनुभव किया है। अंदमान का जीवन, जैसा ये वर्णन कर रहे हैं, इससे अधिक असहनीय तो नहीं है। अर्थात् वैसा ही तो नहीं जैसा यह बखान कर रहे हैं। हां, हो सकता है, वैसा ही हो। पंरतु क्या वह मेरे भाग में होगा? असंभव, सर्वथा असंभव। उनकी अवस्था कैसी है जो राजबंदी पहली बार ही अंदमान गए थे? क्या मेरी उनसे भेंट होगी? और मेरे ज्येष्ठ बंधु?
कोई भी निश्चित जानकारी नहीं दे सकता था। बस इतना ही ज्ञात हुआ कि वे लोग वहां हैं। कारागृह में हैं। प्रायः मैं भी उधर ही जाऊंगा।
सभी कह रहे हैं, आज अंदमान आएगा। प्रातःकाल के छह बज चुके थे, सभी दंडितों को पंक्ति में ऊपर लाया गया। ऊपरी तल्ले पर लास्कार आदि सेवक जहाज धो रहे हैं। बढ़ते-बढ़ते सूरज का ताप प्रखर हो गया। आज बंदियों के मन
दो सुनिश्चित पंक्तियों में चलते-चलते उनकी बेड़ियों की लयबद्व झनझनाहट- यह सारा दृश्य देखते समय एक तरह का भयंकर मनोरंजन अवश्य हो रहा था।
क्रूर डकैत
वह देखिए , एका डाकू- उग्र, दाढ़ी-मूंछे, लंबे-लंबे बाल। उजड्ड-जंगली मोटी-मोटी और क्रूर गोल-गोल घूमती आंखें, वह सिंधी मुसलमानों में एक छंटा हुआ क्रूर डाकू! ब्ंदी के वस्त्र भी बड़ी सुघड़ता के साथ बांधकर, पैरों की बेड़ियों सहजतापूर्वक कमर में बांधकर अपना बिस्तर बगल में दबाए, किसी को ऊंची आवाज में पुकारता