मेरे बहाने सतत राजनीति की चर्चा छिड़ती। जिन्होंने यह सब कभी नहीं सुना था, उन्हांेने उसे सुना; जिन्हें कभी सूझा नहीं था, उन्हें सूझा और जिन्होंने इसे कभी नहीं माना था, उन्हांेने मान लिया।

बारी बाबा की कहानी

दूसरी महत्तवपूर्ण बात, जो वहां की परिस्थिति में मन को अपनी ओर खींचती, वह यह ज्ञात करना था कि कालापानी कैसा है। जो भी कोई वहां से आता, उससे यही


पूछने को जी चाहता। प्रत्येक व्यक्ति एक ही बात पूछता। फिर मुझे भी पूछने की इच्छा होती। अंदमान के सिपाहियों की वह टोली, जो बंदियों को लेने आई थी, उससे पूछते क्योंकि वही इस विषय के प्रमुख अधिकारी और वही इसके ज्ञाता! कलेपानी का नाम लेते ही वे सबसे पहले ‘बारी बाबा’ की कहानी सुनाते।

उनकी धारणा थी कि बारी बाबा ही कालापानी है। उन दंडितों में से जो अत्यंत निर्दय बंदी होते, वे बिना किसी कारण हो-हल्ला करके आपस में गाली-गलौज


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देने लगे। ‘चालान’ आ गया’, ‘कहां आ गया?’, ‘हां-हां, ठेठ द्वार पर है।’, ‘कितने हैं?’, ‘कैसे हैं? आादि प्रश्नों तथा उत्तरों की झड़ी लग गई और बंदियों में ही नहीं अपितु सिपाहियों में भी भगदड़ मच गई, क्योंकि वे भी अवश्य ही उतने ऊब चुके होंगे जितने कि ये बंदी। इतने में ‘झन्-झन्’ की गहरी लयबद्व झंकार निकट आने लगी। प्रत्येक बंदीवान अकेला या झुंड बनाकर उस मार्ग के आस-पास पल भर के लिए अनुशासन को ताक पर रखते हुए छिपकर बैठ रहा है। आ गया, चालाान


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