खुला-का-खुला ही रहेगा, चारों ओर दुर्गघि छोड़ेगा। समर्थ रामदास स्वामी ने यह स्पष्ट कहा है-
‘भक्षण करते ही सुग्रास अन्न। आधी विष्ठा आधा वमन।
पीते ही भागीरथी का जीवन। मूत्र होय तत्काल।’
तो फिर ‘चाहे राजा हो या रंक। पेट में विष्ठा नहीं चुकती।’ यह यदि सत्य है तो अपने आपके मल-मूत्र का उपसर्ग जिस तरह अनिवार्य समझकर तुम शांत लेटे रहते हो इसी तरह उनके उपसर्ग को भी तुम क्यों सह नहीं लेते? इस जगत् में देह धारणा के रेचन करके पुन्ः कुछ इंद्रियों को जो प्रिय है, वह अन्य इंद्रियों के लिए असहनीय क्यों किया गया? प्रकृति का यह न्याय वही जाने कि एक देह की इंद्रियों में भी यह विषम परस्पर विद्वेष क्यों उत्पन्न किया? अथवा हो सकता है, उसका उपाय न हो अथवा उनके उस परस्पर कलह से उसे आनंद हो रहा हो।
और फिर इस तरह विवेक सेना को विद्रोही इंद्रियों के पीछे
शब्द है। कालेपानी का दंड उन बदमाशों को दिया जाता है जिन्हें सारे इलाके में अन्य सभी अपराधियों से भंयकर तथा नृशंस समझा जाता है। कालेपानी के इन दंडितों मंे से जो भयंकरों में भयंकरतम सिद्व होेते हैं, उन्हें आजन्म कारावास का दंड होता है। उन्हें पहले इलाकों के स्थानीय कारागारों में रखा जाता है, तत्पश्चात् कुछ दिनों बाद उनकी परीक्षा ली जाती है। इसमें जो स्वदेश और स्वसमाज में रखने के अपात्र सिद्व होते हैं, उन्हें उनके संबंधित ठिकानों से ठाणे भेजा जाता है? और वहां इन अपराधियों, जो देश