एक बंदी उस पीपे पर आने-जाने लगा। गंदगी तथा घिनौने दृश्य की चरम सीमा हो गई। मैंने अपनी आंखे बंद करके सोने का स्वांग रचाया, ताकि उन बंदियों को संकोच न हो। मन कसमसाया, ‘हाय-हाय! यह तो जीवित नरक भोगना पड़ रहा है तुम्हें। ‘विवेक ने समझाया, ‘ बावले, यह सत्य है, पर यह भी अपना-अपना विचार है। यह तुम्हें विशेष सुविधा मिल रही है न! तो फिर उसका विशेष उपयोग क्यों नही कर लेते? जाति-पांति, गोत्र, वर्ग का ही नहीं अपितु शील तथा शुचिता का भी अंहकार चकनाचूर करने के लिए ही ईश्वर ने तुम्हें यह अवसर तो नहीं प्रदान किया? इस विशेष्ज्ञ सुविधा का विशेष उपयोग करो। त्रैलिंग स्वामी पर न्यायलय में अशिष्ट व्यवहार के लिए जब अभियोग लगाया गया था, तब उनके साधुत्व की खिल्ली उड़ाने के लिए मजिस्टेªट ने व्यंग्य किया, ‘‘परंतु ये अद्वैतवादी
भोजन के समय अन्न ही क्यों ग्रहण
का भी अपहरण किया जाए, इससे अन्य बंदियों को दुःख हुआ और कुछ सिपाहियों ने ठान ली कि वे इस नीलामी में सामान नहीं खरीदेंगे। मुझे इस बात का पता लगते ही मैंने उन्हें सूचित किया कि उस सामान में अनेक मुल्यवान वस्त्र हैं। उन्हें मिट्टी के मोल किसी ऐसे-गैरे के खरीदने से अच्छा है आप लोग उन्हें खरीद लें, इससे मुझे संतोष होगा। यदि आप जैसे सह्नदय उस नीलामी में च्ुप्पी साधकर बैठेंगे तो ह्नदयहीन लोग बोली लगाएंगे। आप मेरे देशबंधु दूर रहे तो कोई गोरा या नीम सार्जेंट सब लूट लेगा।