इतने में सिपाही ने एक लोहे का बिल्ला लाकर हाथ में दिया। यही वह ’क्रमांक’ है जो प्रत्येक बंदी की छाती पर झुलता है। उस बिल्ले पर बंदी की मुक्ति का दिनांक अंकित होता है। मेरा मुक्ति दिनांक! मुझे मुक्ति भी है क्या? मृत्यु ही मेरी मुक्ति का दिनांक है। कुछ जिज्ञासा, कुछ निराशा, कुछ विनोदमिश्रित भाव से मैंने उस बिल्ले की ओर देखा। मुक्ति का वर्ष था-सन् 1960! प्ल भर के लिए उसका कुछ भी अर्थ उजागर नहीं हुआ। पल-दो पल में ही उसमें निहित भयंकर अर्थ उजागर हो गया। दंड सन् 1910 में और सन् 1960 में!

ं ं ं ं ं ने निर्मम व्यंग्य से कहा, ’’कोई चिंता नहीं। दयालू सरकार आपको सन् 1960 में अवश्य मुक्त कर देगी।’’

मैंने उपहास में कहा, ’’परंतु मृत्यु अधिक दयालू है। उसने मुझे इसके पूर्व ही मुक्त कर दिया हो?’’ दोनों ही हंसे। वह सहज हंसा और मैं प्रयत्नपूर्वक हंसा। सुपरिटेंडेंट


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दुर्घट परिस्थिति में उदित विचारों, विकारों तथा भावनाओं का इतिहास विशेश मनोरंजक होने के साथ-साथ बोधप्रद भी होने के कारण हम इन संस्मरणों में उसे अधिक महत्तव देने वाले हैं; परंतु चूंकि ये संस्मरण त्रुटित हैं और भावनाओं का वह इतिहास अस्पश्ट, सूचक तथा हलके-हलके रूप में ही बताना बेहतर होगा। अतः जब तक संपूर्ण तथा सुसंगत कथन प्रसिद्व नहीं होता, पाठक हमारे अंदमान स्थित जीवन के बारे में कुछ भी साधारण धारणा न बनाएं। यद्यापि इन संस्मरणों में सारी बातें कहना संभव


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