करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा नहीं कि मेरी नाक है और तुम्हारी नहीं है, तो फिर तुम लोगों से अधिक भला मुझे यह गंदगी असहनीय क्यों लगे?’’ उन दंडितों में एक पुराना घाघ मेरे निकट आकर कहने लगा,‘‘दादा, हम इसके आदी हो चुके हैं। मैं कालेपानी से ही आ रहा हूं।’’ उसकी उदारता को मैंने मन से सराहा। मैंने सोचा, ‘हे प्रभो, इन पतितों के अंतःकरण के आंगन में भी एक सुंदर सा तुलसी वृंदावन होता है।’’
मैंने उस घुटे डाकू को धन्यवाद दिया और कहा, ‘‘खुली हवा के लिए डाॅक्टर ने मुझे यह विशेष सुविधा दी है कि मैं सलाखों के पास सो जांऊ। इस पीपे की बात पर उन्होंने गौर नहीं किया। परंतु मैं इसे भी एक विशेष सुविधा समझता हूं। आप चिंता न करें। भला आपको इस गंदगी में ढकेलकर मैं उधर क्यों जाऊं? मुझे भी अब इस तरह के जीवन का आदी होना होगा।’’ रात में एक के पीछे
समझ में नहीं आ रहा था कि उपनेत्र की मांग क्यों? थोड़ी देर बाद सुपरिटेंडेंट आया। मैंने पूछा,‘‘उपनेत्र क्यों लिए गए?’’ उसने बताया, ‘‘राज्यक्रांति के अपराण में तुम्हारी सारी चीजें जब्त¹ की जाएं, ऐसा दंड होने के कारण उन वस्तुओं को जब्त किया गया है। विलायत में जब आप पकड़े गए तब आपके पास से मिले टंªक, कपड़े, पुस्तकें आदि सभी सामान की आज खुले रूप में नीलामी होगी। जो पैसे मिलेंगे वे सरकार में जमा होंगे।’’
निजी संपत्तिा के रूप में एक आने की गीता और उपनेत्रों