भी चित लेटा। सामने ही एक बड़ा सा पीपा आधा काटकर रखा हुआ था। उधर थोड़ा रिक्त स्ािान था। उस पिंजरे में अन्यत्र बहुत भीड़ हो गई थी, उसकी तुलना में मेरे कोने में कम भीड़ थी और इसी कारण मुझे इस कोने में बिस्तर बिछाने की सहूलियत दी गई थी। परंतु इतने में सड़ी हुई दुर्गंध का इतना तीव्र भपारा आया कि नाक सड़ गई। मैंने अपनी नाक जोर से दबाकर बंद की। यह देख निकट के एक बंदी ने संकेत किया कि धंुधले उजाले में रखा वह पीपा देखो। देख तो ज्ञात हुआ कि यह पीपा ही रात भर सभी प्राणियों को शौचकूप के स्ािान पर काम आनेवाला है। मेरी दृष्टि उधर जाते ही वह बंदी, जो उस पीपे पर बैठा था, बेचारा संकोचवश उठने लगा। परंतु मैंने संकेत से उसे बैठने के लिए कहा, ‘‘अरे, यह तो देहधर्म है। भला इसमें लज्जा कैसी? थोड़े समयोपरांत मुझे भी उधर ही बैठना होगा। किसी को भी संकोच
भर के लिए भी वे चूं तक नहीं करते हुए कहा ‘‘अर्क हैं अर्क, अवतारी हैं ये। ‘‘इसका निश्चित अर्थ आज तक मैं नहीं जान सका। हो सकता है, उसे संदेह हुआ हो कि मद्रास की जो वार्त्ता उसने सुनी, वह मैंने भी सुनी होगी और मेरे उत्तर का व्यंग्य उसने समझा हो।
उपनेत्रों की नीलामी
उस समय मेरे पास मेरी अपनी केवल दो चीजें थी- एक मेरे उपनेत्र (ऐनक) और दूसरी एक आने की छोटी सी अंगुलाकार गीता। ये दो वस्तुएं ही मेरी संपत्तिा थी। पंरतु आज सवेरे हवलदार ने इन दो वस्तुओं की भी मांग की,‘‘साहब मांगता है।’’ मेरी