हुआ है-केवल उन्हें ही नहीं अपितु सहÛाधिक दंडितों को भी, जिनकी पंद्रह बरस के दंड से ही सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी, धीरज बंधता। उन सभी बंदियों का दुःख मुझे देखते ही हलका हो जाता।
जलयान की गंदगी
कुछ देर बाद संध्या हो गई। गरमी से जान निकलती, तिसपर इतना भीड़-भड़का। उन चालीस-पचास लोगों में, जिनमें हिंदु-मुसलमान सब थे, कुछ तो घिनौने जीवन के अभ्यस्त बनकर निर्लज्ज बने हुए थे; चोर-उचक्के, डाकू, पापी-दुष्ट, असाघ्य इंद्रिय रोग से ग्रस्त; कुछ ऐसे घिनौने, जिन्होंने वर्षों से दांत भी नहीं मांजे थे। इस तरह के चालीस-पचास आदमियों की बिछौनों पर बिछौने बिछाए हुई भीड़भाड़ में मैं भी अपना बिस्तर बिछाकर लेट गया। मेरे पैरांे से किसी का सिर सटा हुआ था। मेरे सिर से ही नहीं अपितु मुहं के पास किसी की टांगे सटी हुई और तनिक उधर मंुह करे तो मुख से मुख
सटा हुआ। पल
उसने जल्दी से आते हुए कहा, ‘‘ मद्रास में अशे नाम के एक कलेक्टर को- एक शाक्त ब्राह्मण ने¹ गोली से उड़ा दिया। सुना है, चिदंबर पिल्लै के प्रकरण से उस अधिकारी का कुछ संबंध था। ’’ वह हवलदार जब दोपहर में पुनः आया तो मेरी ओर घूरते हुए उसने कहा, ‘‘ क्यों महाराज, मद्रास में आपका कोई स्नेही रहता है!’’
‘‘इस बंदीशाला में रहकर भला मैं कैसे जान सकता हूं कि कौन कहां है और थोड़ी देर पहले आप ही ने तो कहा था कि जो कोई हैं वे बुरके में बैठे हैं। कहने