रोने लगे। ‘अब कालापानी लग गया! भैया, रो मत। कालेपानी में रोने से कुछ नहीं होता। ’ इस तरह इन दंडितों में से जो छंटे हुए बदमाश अपराधी थे, दार्शनिक की तरह बीचोबीच खड़े होकर सभी को सांतवना दे रहे थे। बीच ही में किसी ने मेरी ओर संकेत करते हुए कहा,‘‘ देखो भैया, तुम्हारी-हमारी छोड़ो। वह देखो, बालिस्टर साहज! भई, अंग्रेज अफसर भी टोपी उतारकर इन्हें प्रणाम करते हैं। भला इनके दुःख के सामने हमारा दुःख क्या है?’’ इतना कहने की देर थी कि धीरे-धीरे सभी मेरे इर्दगिर्द जम गए। प्रायः सभी को ज्ञात ािा कि मुझे पचास वर्षो का दंड मिला है, तथापि हर कोई पूछता-कितने वर्षो का दंड
मैंने अपने गले में लटका हुआ क्रमांक का वह बिल्ला ही उनके हाथों में थमा दिया। बार-बार ‘पचास-पचास की रट लगाते हुए मैं ऊब सा गया था। यह सुनकर कि सचमुच ही मुझे पचास वर्षों का दंड
पकड़े गए। बाकी सारे बुरकों में छिप गए। किसी ने चूं तक की हो तो शपथ! कैसा समाचार! अरे, आप मरे दुनिया डूबी।’’
अर्क हैं अर्क
हाल ही में इंग्लैंड में राज्यारोहण समारोह हुआ तो बंदियों में यह अफवाह उड़ गई थी कि इस अवसर पर छूट मिलेगी। वह हवलदार मेरे साथ बात करके गया ही था, इतने में एक और अधिकारी, जो मुझे कभी-कभी कुछ समाचार देता था, आ गया। उसे पत्र पढ़ने में रूचि नहीं थी। परंतु मुझे समाचार देने थे, इसलिए वह थोड़े पत्र छांट रहा था।