वे सभी अधिकारी अपनी टोपियां उतारकर प्रणाम करके चले गए। एक गोरे गृहस्थ को जैसे उनका यह व्यवहार अखर गया और वह हेय तथा क्रुद्व दृष्टि से उन्हें और मुझे घूरकर बिना प्रणाम
किए चलता बना । जैसे उसकी दृष्टि जता रही थी-’ भला इस पापी बंदी को इतना सम्मान क्यों?’
प्रस्थान
जहाज की सीटी के पश्चात् भों-भों-भों की कर्णकटु आवाज आई और एक हिचकोले के साथ जहाज चल पड़ा। उसक पिंजडे़ की ऊंचाई पर दो-तीन छोटी-छोटी गोलाकार खिड़कियां थी, जो शीशे से बंद की गई थी। उनसे लटकते हुए, उन अभागे दंडितों में से कुछ तट की ओर टकटकी लगाकर देखने लगे-किनारा दृष्टि से ओझल हो गया। ‘घर छूट गया भई, घर छूट गया’ कहते हुए उनमें से एक धम्म से नीेचे बैठ गया। यह सुनते ही‘ अब अपना देश हम पुन‘ कब देखेंगे?’ ऐसे बिलबिलाते हुए सतारा की ओर के दो किसान फूट-फूटकर
मेरा तेजाभंग करने के लिए ही हेतुपूर्वक नियुक्त किया गया था अथवा उसका उस तरह का व्यवहार मात्र सहानुभूतिपूर्ण वाहियातपन था। कुछ भी हो, उसका वह गीत आज भी मेरे कानों में गूंज रहा है,‘ अजब तेरी कुदरत अजब तेरा खेल, मकड़ी के जाल में फंसाया है शेर। एक दिन मैंने उससे कहा, ‘‘ कुछ समाचार सुनाओ।’’ उसने कहा, ‘‘कैसा समाचार? दादा, इन लोगों के कारण आप व्यर्थ मरे और अब भी आपको उनका मोह नहीं छूटता? ओह, कैसे लोग और कैसा लोकहित? देखो, आप