प्रकरण-5

कालेपानी का सागर

उस जलयान की सीढ़ी से चढ़ाकर मुझे सीधे उसके तलमंजिल पर ले जाया गया। उधर एक बड़ा पिंजरा बनाया गया था, जिसमें लोहे की मजबूत छडे़ं लगाई गई थी। इस जहाज का वह पिंजरा बहुत लंबा किंतू संकरा था, जिसमें कोई बीस-तीस व्यक्तियों को ही रखा जा सकता था। परंतु हेतुपूर्वक वह इस तरह बनाया गया था कि जिसमें आजन्म कारावास के कालेपानी के बंदीवान जानवरों की तरह ठूंसे जाते। उसमें मैंने देखा कि उन बंदियों को, जो ठाणे से आए हैं, ठेलाठेली के साथ ठूंसकर खड़ा किया गया है। मैं मन-ही-मन सोच रहा था, क्या मुझे भी इस जहाज के इस घुटन भरे तलमंजिले के अंधेरे पिंजरे में इन बंदियों के साथ ठूंसा जाएगा? इतने में ही उस पिंजड़े का द्वार खुल गया और मुझे उसी में ठूंस दिया गया। इंग्लैंड में ‘ब्रांकाइटिस’ रोग का शिकार हो जाने के कारण मुझे जरा से


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सूक्ष्माः’¹ - यह योगसूत्र बोलते हुए अपने मन को सिखाता िकइस कारावास में तुम्हें मानसिक यातना भी उसी तरह सहनी होगी जैसे शारीरिक यातनाएं। इससे यदि तुम्हारा तेजाभंग होता है तो यह माना जाएगा कि तुम्हारा तेज एक क्षणिक उत्तोजना ही थी। तुम ऐसा क्यों नहीं सोचते कि उन्हें इस खेल में आनंद आ रहा है? तुम्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है न कि इस खेल के नायक तुम हो? केवल इस तरह की वृत्तिा को मार लो। तुम तो अच्छी तरह से जानते हो कि तुम कौन हो? तुमने क्या और क्यों किया है? चोरों


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