दर्शक मन को स्तंभित अथवा व्याकुल करके शवयात्रा की ओर खींचती है, वह शव उनका आकलन नहीं कर पाता। परंतु मैं सब कुछ का आकलन कर रहा था कि मेरी अरथी सजाई जा रही है, मेरी अरथी निकल रही है। मुझे इस यथार्थ का भी बोध हो रहा था कि इन सैकड़ों दर्शकों की दृष्टि, जो मुझपर टिकी हुई है, वह प्रायः निर्मम तथा तटस्थ है। जिस तरह राह चलते आकस्मिक रूप से किसी की निकली हुई अरथी हम देखते हैं, पल भर उसकी ओर देखते-देखते हम अपनी राह जाते हैं। उस समय इस बात का आकलन होने से कि मै। शव बन रहा हूं, मुझे इस यथार्थ बोध का ही अधिक दुःख था कि हजारों देशबाध्ंाव मेरी ओर मात्र आंखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं। काश, उनमें से एक भी मनुष्य मुझे इस तरह ढाढ़स बंधा पाता कि ‘जाओ बंधु, जाओ! तुम्हारे पीछे मैं और हम तुम्हारे व्रत को पूरा करके अपने इस हिंदुस्थान के ं ं ं ’ तो मेरी वह अरथी मेरे लिए फूलों की सेज बन जाती।
की बागडोर आप कैसे हथियाएंगे? आपको क्या लगता है, कितने दिनों में आप छूटेंगे? इस दिसंबर में दरबार है (यह उस समय की बात है जब जाॅर्ज पंचम गद्दी पर बैठनेवाले थे) तब छूटेंगे? ‘मैं कहता, न-न, भई, हमारे लिए जुबली कैसी? तथापि कभी दस-बारह वर्षों में समय बदला तो बदला। ’ तो वह अत्यंत कड़वा मुंह बनाकर कहता,‘ छिह, तुम्हें वे क्योंकर छोडे़गे, आपकों यों ही सड़ने देंगे, मरने के पश्चात् ही छोड़ेंगे’।
कांटों का मुकुट
मैं पुनः-पुनः मन-ही-मन ‘प्रतिप्रसवहेयाः