और शव को अरथी पर सजाना एक ही बात थी। आज तक जो सैकड़ों-हजारों बंदी आजन्म कारावास की सजा काटने इस भयंकर जलयान पर चढ़कर कालेपानी गए, उनमें से दस भी जीवित वापस नहीं लौट सके। अठारह-बीस वर्ष की चढ़ती आयु के युवकों पर इस जलयान पर पैर रखते ही अस्सी वर्ष के बूढ़ों जैसी मुर्दनी छा जाती। मनुष्य एक बार अरथी पर बांध लिया गया कि उसके परिजन समझते हैं कि यह इस संसार से सदा के लिए जा रहा है और भावना से दुःखित, विस्मित होकर शून्यवत् उसकी उस निकलती अरथी की ओर देखते रहते हैं- ठीक उसी दृष्टिकोण से वे मेरी ओर देख रहे थे। उनकी मुदा से यह भाव स्पष्ट परिलक्षित था कि मैं अब इस जगत् के लिए मर चुका- और यह भावना सत्य थी। सचमुच ही मुझे अरथी पर चढ़ाया जा रहा था। अंतर बस इतना ही था कि शव को अरथी पर चढ़ाते समय जो भावनाएं
कितना सुखी हूं। महीने-के-महीने वेतन पाता हूं, तिस पर पेंशन है ही। पचास-साठ रूपये खनखनाते हुए मजे में जीवनयापन कर रहा हूं। और आप- कुंदन जैसा दमकता रूप, खिलता यौवन, बालिस्टरी, दीवान की बेटी ब्याही हुई सर्वनाश किया आपने अपने जीवन का, स्वर्गीय सुख का । किसलिए? देश के लिए? दीवानगी है दीवानगी राव!’ मैं यह सब शांति से सुन लेता, परंतु कभी-कभी वह मेरे धैर्य का बांध भी तोड़ डालता। हाथ जोड़कर मुझसे कहता, ’महाशय, बताइए, सच-सच बोलिए-शासन