कहने लगा, ‘‘उन्हें सबकुछ ज्ञात होगा। केवल आप उन्हें उकसाने का प्रयास कर रहे हैं और वे आपको उकसा रहे हैं।’’
वह छोटी नौका, जो मुझे लेकर आई थी, अंदमान से आई हुई ‘महाराजा’ नामक विशाल वाष्पनौका से सट गई। मुझे हथकड़ी पड़ी हुई थी ही। उसके साथ ही उस जलयान की सीढ़ी पर कडे़ पहरे में मुझे चढ़ाया गया। मैं ऊपर चढ़ ही रहा था कि उस समय जहाज में सवार हुए यात्री, नौकर-चाकर, अधिकारी तथा आस-पास की छोटी-छोटी नौकाओं में सवार होकर आए हुए दर्शक वह दृश्य देखने के लिए धक्कम-धक्का करने लगे और अंदमान के उस जहाज पर मुझे सवार होते हुए ऐसे देखने लगे जैसे हम किसी शव को अरथी पर चढ़ाते और ठीक तरह से बांधते हुए विस्मय और जिज्ञासापूर्वक देखते हैं।
उस ‘महाराजा’ जलयान पर किसी बंदी का, जिसे आजन्म कारावास हो गया है,
सवार होना
यह पक्का है। ‘फिर झट से आवाज पलटकर अति विन्रम स्वर में कहता, ‘अजी विलायत में ही रहकर किसी छैल-छबीली के रंग में रंगकर अपना यौवन बिता देते! क्हां यह आपका तारूण्य और उस पर कैसी मुसीबत! भला आपको ये लोहे की बेड़िया पहनने की हौंस क्यों लगी?
कभी वह कहता,‘ न-न! यह घोर कर्म हमारे दादा कर ही नहीं सकते। लगता है, कुछ बड़े-बडे़ नामवर लोगों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए हमारे इस भोले शंकर को आगे करके सब्जबाग दिखाकर इन्हें मुंह के बल गिरा दिया। दादा, आपकी अपेक्षा मैं