नहीं होगा। आप फ्रांस लौट जाएंगे, ऐसा आदेश भी आ चुका है, ऐसा मैंने सुना है। आप बंदियों में काम करेंगे? राव साहब, ईश्वर ऐसा कभी नहीं करेगा।’’
इतने में एक सिपाही भागता हुुआ आया और बोला,’’हवलदारजी, साहब आता है।’’ धड़ाम से दरवाजा बंद हो गया। भोजन परोसते हुए वे लोग आगे निकल गए। सुपरिटेंडेट आया और नियमानुसार परंतु सहानुभूति शब्दों में मुझसे बोला,’’आगे से आपको बंदी के कपड़े तथा अन्न मिलेगा। आपका पचास वर्ष का दंड आज से लागू हो गया है।’’
मैं उठा, अपने घरेलू कपड़े उतार दिए, बंदी के कपड़े ले लिये और पहनने लगा। मन कांप गया। ये वस्त्र-बंदी के वस्त्र, जो आज श्शरीर पर चढ़ रहे हैं- अब फिर कभी उतरनेवाले नहीं है। इन्हीं कपड़ों में मेरी अरथी निकलेगी। धुंधले से विचार ं ं ं ं ं किंतू मन उदास सा हो गया। सुपरिटंेडंेट यूं ही कुछ इधर उधर की बात कर रहा था। उसके संवाद में मन को बलात् उलझाया।
स्थिति में जो कुछ बतलाया जा सके, वह हमारा अंदमान का वृत्तांत है- यह कह देने का निश्चय हमने किया है। सुसंगत वृत्तांत-कथन असंभव है, यह तो जाहिर है। अतः जो कुछ संक्षिप्त, टूटे-फूटे तथा संबंधविहिन संस्मरण हम बता सकेंगे, उन्हीं के प्रति पाठक संतोश् मान ले और उनके बीच जो विसंगतियां अथवा अस्पश्टता होगी, उसे परिस्थिति का दोश मानकर कुछ दिनों के लिए क्षमा कर दें।
हम जानते हैं कि ऐसे वृत्तांत का सार्वजनिक उपयोग बहुत बड़ा है ; परंतु केवल वृत्तांत से अधिक ऐसी