वार्त्ता उगलंूगा- मद्रास अधिकारियों में से एक भारतीय अधिकारी, जिन्होंने अंग्रेजी वेश धारण किया था- मुझसे मिले। सागर में अंदमान का जलयान ‘महाराजा’ आया हुआ है। सारे बंदी एक बड़ी सी नाव में ठेलाठेली करके उधर रवाना किए गए। बस मैं ही शेष रह गया था। इतने में मुझे ले जाने के लिए ये और अन्य एक-दो अधिकारी एक छोटी नाव के साथ आ गए। मैं उस छोटी नैया में बैठ गया। मैं स्वयं अपनी ओर से कभी किसी से वार्त्तालाप प्रारंभ नहीं करता, क्योंकि मैं ठहरा एक बंदी, कोई भी फटाक से डांट पिलाएगा,‘चुप रहो।’ कुछ समय के पश्चात् इधर-उधर का कुशल-मंगल पूछकर उन अधिकारियों ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की कि इंग्लैंड स्थित क्रांतिकारियों की मेरे पीछे कैसी अवस्था हो गई होगी। मैंने कहा,’’ यह तो आपको मुझे ताव दिलाने के लिए उन्होंने कहा, ’’ हां, यह भी सत्य है। और कैसे अकिंचन पड्यंत्र! चार लोग


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यह गीत गा-गाकर स्वांग करता, नाचता और स्वयं ही पूर्व पक्ष-उत्तर पक्ष करते हुए विवाद छेड़ता कि ‘कहां इतनी प्रबल सरकार और कहां ये अकिंचन चार बच्चे! च्ले हैं अंग्रेज सरकार का राज लेने।’ ऐसा कहते हुए हाथ में पकड़ा सोटा तलवार जैसा घुमाते हुए- दो-तीन पैंतरे काटकर नाचता और अपने साथ लाए दो-तीन कैदियों से वह पूछता, ‘क्यों रे रामू, मेरे इस तरह वार करने से हवा मरी?’ सब लोग जोर-जोर से ठहाके लगाते। हवलदार की ठिठोली थी! न हंसे तो मुसीबत। कब


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