परंतु हमारे घाव इतने हरे हैं कि इतने शीघ्र कैसे भरेंगे? इस तरह की आशा पर निर्भर रहना मूर्खता ही होगी।’’ उन्होंने इतने आश्वस्त स्वर में कहा, जैसे कि वह जताना चाहते थे कि अधिकारी होने के नाते वे कुछ विशेष जानते हैं, ‘‘मुझपर विश्वास रखो। आप अवश्य मुक्त होंगे। अच्छा, आपसे विदा लेता हूं। आपके धीरोदात्त आचरण की अमिट छाप (ज्ीपे लवनत कपहदपपिमक बवनतंहम) मेरे मन पर अंकित हो गई है।’’ अन्य अधिकारी भी विदा लेते हुए चले गए। मार्सेलिस की लंबी-चैड़ी गप्पें सूनने के कारण उनकी यही धारणा बनी थी कि इस यात्रा मंे भी मैं उन्हें बहुत तंग करूंगा। अंगे्रज को देखते ही मेरे तन-बदन में आग लग जाती है। मैं कोई उद्दंड, अशिष्ट तथा भयंकर व्यक्ति हूं। परंतु इस यात्रा में उन्हें जरा भी कष्ट न हुआ और मुझे अंत में मद्रास के अधिकारियों को सौंपने के पश्चात् जैसे उनका मन शांत हुआ
प्रयास किया-माना कि स्वार्थ हेतू लूटमार एक प्रकार से वीरता है तथापि वह श्रेयस्कर अथवा प्रशंसनीय नहीं है। वह भी समझ गया और आगे फिर कभी उसने डींग हांककर डाका डालने का उल्लेख नहीं किया।
मेरे आने के पश्चात् एक-दो दिन के अंदर की बाल को ठाणे से स्ािानांतरित करके कहीं अन्यत्र भेजा गया। अधिकारी जानते थे, यद्यपि इसमें संदिग्धता थी कि पुनः उसकी भेंट होगी या नहीं, तथापि इतने निकट एक भीत की आड़ रहते हुए भी उन्होंने उससे मेरी भंेट नहीं होने दी। उसके पश्चात् वर्षों