लाएगी? यह आशा करना एक मानसिक आश्चर्य ही है। साइबेरिया में भी‘रूस! हाय मेरा रूस’ करते-करते मेरे भी प्राण पखेरू उड़ जाएंगे।
मद्रास आ गया। लेल से उतरते ही मुझे एक तरफ सभी बंदियों से अलग करके पहरे में रखा गया। गाड़ी के साथ एक यूरोपियन अधिकारी बड़ी दूर से आया था। हो सकता है, वह रेल का अधिकारी हो या पुलिस का । वह हर दो-तीन स्टेशनों के प्श्चात् उन आधिकारियों में, जो मेरी निगरानी के लिए नियुक्त किए गए थे, किसी एक से कुछ बात करके मुझे देखकर वापस लौटता। संभवतः अब वह मुझे छोड़कर वापस लौट रहा हो। मेरे पास आकर वह बात करने लगा, उसका गला रूंधा हुआ था, ‘‘ळववक इलमए थ्तपमदक! ( अलविदा मित्र!) मुझे लगता है, आप प्रभु कृपा से दिसंबर में राज्यारोहण के
समय मुक्त होंगे।’’ मैंने कहा, ‘‘ आपकी शुभकामना के लिए आभारी हूं।
मैं शूर पुरूष हूं, और इसीलिए आप जैसे साहसी, पराक्रमी पुरूष का मैं बंदा हूं। भला मेरा कैसा साहस! म्ेरी मुक्ति होने में दो महीने शेष हैं। साहस तो आपका है कि ऐसे प्रसंग में भी आप इतने प्रसन्न हैं।’’
पत्र पहुंचा दिया
उसने जाकर विश्वासपूर्वक बाल को पत्र पहुंचाया। परंतु उसकी शूरता की व्याख्या मेरे ध्यान से नहीं उतरी। डाकू लोग चोरी को पाप और तुच्छ कर्म समझते हैं। मांग जाति के लोग डोमों को नहीं छूते! इसी तरह यह भी। दूसरे दिन मैंने उसे अन्योक्ति द्वारा सूचित करने का