तीव्रता तथा छअपटाहट उतनी ही असहनीय थी जितनी अंतःकरण स्थिति ऊष्मा की। इस स्थिति में वह रेल मोगलाई मैदान में से होती मद्रास चली।

जब मन अधिक टूटता तो रूस से साइबेरिया जात राजनीतिक बंदियों की टोलियांे की यात्रा में जो दुर्गध बनी थी, उसका स्मरण करके मैं अपने मन को समझाता, ‘अरे, अभी भोगा ही क्या है तमने? यह कोई कहने की बात थोडे़ ही है? जो करेगा सो भरेगा। जो भरेगा सो करेगा।’

गांव के पीछे गांव, नगरों के पीछे नगर छोड़ती हुई, वन-उपवन, पर्वत, नदी-नालों को पार करती वह रेलगाड़ी किसी हड़काई हुई शेरनी की तरह मुझे मुहं में दबाए भागती जा रही थी। हाय-हाय! जितनी तीव्र गति के साथ वह मुझे अपनी मातृभूमि से कालेपानी की ओर खींचती हुई ले जा रही है उतनी ही तीव्र गति से वह कालेपानी से अपनी मातृभूमि पर मुझे कब लाएगी? कभी लाएगी भ्ज्ञी कि नहीं? कैसे


103 of 1280

भला वह हम ही क्यों न हों? इस तरह मात्र जलते रहना भी एक कर्म ही है । इतना ही नहीं, अपितु महत्कर्म है।’¹ ं ं ं ंवाॅर्डर ने संकेत रूप में खांसकर सूचित किया, ‘जल्दी करो’। मैं पाटी को द्वार के निकट रख पीछे हट गया। जाते-जाते उससे कहा, ‘‘मैं चाहता हूं, मेरे कारण आपको जरा सा भी कष्ट न पहुुंचे। आप चाहें और यदि आपको यह कर्तव्य लगता हो तो ही ऐसा साहस करें। हमने भरे गांव में प्रवेश करके सरे बाज़ार डाका डाला है और लड़ते-लड़ते निकल भी गए। दादा,


103 of 2123