उन पर कड़ी पाबंधी नहीं थी। गाड़ी छूटने के बाद जहां-जहां वह खड़ी होती, उस स्टेशन पर पहुंचने से पहले मेरे डिब्बे की सारी खिड़कियां बंद कर दी जाती। जब से इंग्लैंड छूटा, मैंने कभी खुली खिड़कियो वाले डिब्बे में बैठकर यात्रा की ही नहीं। परंतु इस स्टैशन पर मेरे साथ आए हुए एक अधिकारी ने न जाने पहले से ही वहां के विदेशी लोगों से क्या सांठगांठ की थी, मेरे डिब्बे की खिड़कियां खोल दी गई। काफी गोरे लोग थोड़ी-थोड़ी दूरी पर खड़े थे। मैंने देखा, उनमें से कुछ लोगों ने उत्सुकता के आवेश में अपनी मेमों को कंधों पर उठाया हुआ था। एक ने मुझे संकेत किया, खिड़की के पास खड़े रहो। मैं खड़ा रहा तो ‘ज्ीमतमश्े ीमए जींज पे ैंअंतांत’ का हल्ला सुनाई दिया। ये गोरे लोग भी, जिन्होंने मुझे देखने के लिए वहां भीड़ लगाई थी, इतना निकट नहीं आ पाए कि मुझसे दो बातें करें। चार-पंाच गोरे आकर चले गए, परंतु
किसी का भी नाम, गांव, अता-पता कोई विशेष कार्यøम न लिखते हुए अंदमान के अंधेरे फलक पर आशाओं की दो-तीन तूलिकाएं मारते हुए लिखा कि ‘यदि वहां के नियमानुसार मुझे अपना परिवार पांच-दस वर्षो के लिए ले जाने की अनुमति दी गई तो मैं अपनी जीवन साधना में व्यतीत करूंगा और यदि मैं पुनः हिंदुस्थान की पावन धरती के तट पर अपना पैर नहीं रख सका, तो ततः प्राचेतसः शिष्यौं रामायणमितस्ततः मैथिलेयौ कुशलवौ जगतुर्गुरूचोदितौ की तरह ही, उन अभिनव कुमारों
के कंठांे से देश भर