ठूंसा गया। मेरे हाथों में जो हथकड़ी थी, उसका दूसरा सिरा एक भीमकाय अंगे्रज अधिकारी के हाथ से जकड़ा हुआ था। मेरे लिए उस बेचारे को हथकड़ी पहननी पड़ी। मेरे पैरों में बेड़ियां तो थी ही, हाथ में हथकड़ी थी। इतना ही नहीं अपितु उसने मेरे दूसरे हाथ को भी कस लिया था। धोती खोंसनी हो तो उसके हाथ से खोंसनी पड़ती। उस अधिकारी के हाथ से मेरा हाथ बांधने के कारण शौच, लघु शंका सब विधियां साथ-साथ, सोना भी साथ-साथ। कई यात्राओं में इस प्रकार का घिनौनापन तथा कष्ट सहना पड़ा।
मुझे डिब्बे में ठूंसा गया। परंतु ऐसा नहीं कि किसी ने मुझे देखा ही नहीं। जो लोग उधर उत्सुकतावश आए हुए थे उन्हें दूर खदेड़ा जाता। परंतु कुछ सूरोपियन भी देखने के लिए आए थे। वे डिब्बे के पास आते, उनमें से कुछ लोग बंद खिड़कियां खोलकर देा शिष्ट शब्द शिष्टतापूर्वक बोलते अथवा उद्दंडतापूर्वक देखकर चले जाते।
हुए बिना नहीं रहता। दुष्टों में दुष्ट समझे जानेवाले इस घातक डाकू के मन में भी मेरे लिए इतनी सहानुभूति है, यह देखकर मैं दंग था। यही अनुभव आगे चलकर मुझे बार-बार हुआ। मैं उसका आभार प्रदर्शित करने लगा, परंतु जल्दी-जल्दी में उसने कहा, ‘‘दादा, तुरंत से पहले लिखकर दो।’’
छूटेंगे या मरेंगे
तथापि शंका हुई,‘लिखवाकर इस पाटी को कहीं यह बाल के हाथ न सौंपकर अधिकारियों को न सौंप दे? मेरा जीवन गुप्तचरों से दंाव-पेंच खेलते हुए व्यतीत हुआ था। अतः मैंने