बने। मैं अपनी कोठरी में पीछे सरककर खड़ा रहा। मन में श्शब्द गूंज रहे थे-’पचास वर्ष’।
तभी वे लोग आ गए, जिनके आने की आवाज आई थी। अधिकारी ने द्वार खोलकर मुझे भोजन परोसवाया। हेग का निर्णय आने तक मुझे बंदियों का भोजन या वेश नहीं दिया गया था; क्योंकि कदाचित् तब तक सरकारी आदेश नहीं आया होगा।
भोजन करते समय मैंने हेतुपूर्वक ही अच्छे पदार्थ नहीं खाए तो आधिकारी ने पूछा, ’’क्यों, राव साहब, आज खाते क्यों नहीं?’’
’’खा तो रहा हूं, परंतु वही व्यंजन खा रहा हूं जो सभी बंदियों को मिलते हैं।
कौन जाने, कल उन्हीं बंदियों के साथ मुझे भी काम करने जाना पड़े, कहा नहीं जा सकता। सदन्न कभी मिलेगा, कभी नहीं। हां परंतु कदन्न तो सदैव साथ होगा। उससे मित्रता चिरकाल तक उपयोगी होगी।’’ मैंने हंसते हुए कहा।
अधिकारी ने उतावलेपन से कहा, ’’नहीं-नहीं, ऐसा
तथापि, जो कुछ भी आधा-अधूरा अथवा अल्प-स्वल्प सद्यःकालीन परिस्थिति की परिधि में बतलाने लायक होगा, उसे तो आपको कह देना ही होगा, हमें वह भी सुनने लायक लगने वाला है, इस प्रकार का अत्यंत उत्सुक, निश्पाप तथा प्रेमयुक्त आग्रह विख्यात प्रकाशन मंडलियों से लेकर पाठशाला के बच्चों तक, सभी ओर से हमें अभी भी लगातार होते रहते हैं। इस कारण ऐसे आग्रह का अब सम्मान न करना एक तरफ से विनय का अतिरेक करके सार्वजनिक मनो भंग करना होगा, ऐसा हमें लगने लगा है। ऐसी