मेरा आजीवन कारावास
विनायक दामोदर सावरकर
प्रास्तविक
स्वजनस्य हि दुःखमग्रतो।
विवृत्तद्वारमिवोप जायते।।
-कालिदास
हमारे अंदमानवाले वृत्तांत तथा वहां बंदीवास को निभाते समय भुगतनी पड़ी यातनाओं की कहानी सुनने के लिए न केवल महाराश्ट्र में अपितु समूचे हिंदुस्थान में हमारे हजारों देशबंधुओं ने सहानुभूतिपूर्ण उत्सुकता आज तक समय-समय पर प्रकट की है। उस पर भी, जिन सुख-दुःखों को हमने भुगत लिया, उनका निवेदन सुह्नदों से करते समय समान वेदनाओं से जनित आसुओं के कारण स्निग्ध होने वाले मधुर आनंद का अनुभव करने के लिए हमारा ह्नदय हमारी मुक्तता के क्षणों से स्वाभाविक ही व्याकुल होता आया है।
फिर भी आज तक अंदमान की कहानी होठों तक पहुंचने पर भी किसी तरह होंठों से बाहर नहीं निकल रही थी। अंधकार में बढ़नेवाली किसी कंटीली पुश्पलता की भांति उन अंधियारे दिनों की याद उजियारे को देखते ही सूखने लगती, भौंचक्का हो जाती।
मेरा आजीवन कारावास
विनायक दामोदर सावरकर
प्रास्तविक
स्वजनस्य हि दुःखमग्रतो।
विवृत्तद्वारमिवोप जायते।।
-कालिदास
हमारे अंदमानवाले वृत्तांत तथा वहां बंदीवास को निभाते समय भुगतनी पड़ी यातनाओं की कहानी सुनने के लिए न केवल महाराश्ट्र में अपितु समूचे हिंदुस्थान में हमारे हजारों देशबंधुओं ने सहानुभूतिपूर्ण उत्सुकता आज तक समय-समय पर प्रकट की है। उस पर भी, जिन सुख-दुःखों को हमने भुगत लिया, उनका निवेदन सुह्नदों से करते समय समान वेदनाओं से जनित आसुओं